चिट्ठाजगत www.hamarivani.com

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

संतुष्ट जीवन!

               गाँव की बात करें तो विश्वास कर भी लिया जाए , लेकिन दिल्ली जैसे शहर में कोई  पैदा हो, यहीं पर कार्य कर रहा हो और यह कहे कि वह आज तक ट्रेन में नहीं बैठा। ये कहना मेट्रो तो बहुत बड़ी चीज है। 

          यह एक ऐसे इंसान से मुलाकात हुई जो ऑटो चलाता है इसमें 18 साल की उम्र से ऑटो चलाना शुरु कर दिया था क्योंकि उसके पिता की मृत्यु हो गई थी और वह सिर्फ आठवीं तक पढ़ पाया था , उसके बाद घर के चलाने के लिए इधर उधर काम करके गुजारा किया क्योंकि तायाजी ने पूरा बिजनेस हड़प लिया था। वयस्क होते ही उसने ऑटो चलानी शुरू कर दी। ऑटो किराये का है, जिसका प्रतिदिन भाड़ा देता है और अपने परिवार को भी चलाता है सबसे दुखद बात तो यह बतलाई कि अपनी बहन की शादी के वक्त उसकी ससुराल वालों ने अचानक दहेज की मांग कर दी और उसके सिर छुपाने की जगह थी जो पिता करके गए थे उसको उसी वक्त में बेचनी पड़ी और बहन की शादी कर दी। फिर अपने छुपाने की जगह बनाने के लिए दोबारा नौबत नहीं आई और वह किराए के मकान में रह रहा है फिर भी उसका अपना यही नियम है कि वह प्रतिदिन भाड़े के अलावा ₹1000 जमा करता है और ₹500 अपने घर के लिए रखता है इसके बाद वह अपनी ऑटो खड़ा कर देता है।  अपनी बेटी को अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहता है,  उसका साथ देने के लिए उसकी पत्नी घर में सिलाई का काम करती है।  वह कहता है मुझे अपनी जरूरत और भविष्य की सुरक्षा के लिए जितनी जरूरत है मैं 1 दिन में उतना ही काम करता हूँ। 

             उसके गाड़ी में पेट्रोल ख़त्म होने वाला था, इसे पेट्रोल भरने के लिए पूछा क्योंकि वहां पर लम्बी लाइन लगी थी  तो मैंने कहा तब तो मेरे को बहुत देर हो जाएगी और अगर बीच में ही खत्म हो गया तो बोला कर बीच में खत्म हो गया तो मैं आपको देर नहीं करूंगा मैं आपको दूसरे ऑटो पर बिठा कर भेजूँगा और आपसे पैसे भी नहीं लूँगा। यह मेरा उसूल नहीं है कि मैं सवारी को बीच में छोड़ दूँ। मैं अपने काम के प्रति पूरी तरह ईमानदार और बिना लालच के करता हूँ।  आप बुजुर्ग हैं और  आपकी मजबूरी समझते हुए मैं आपको आपके घर तक छोड़ूँगा चाहे जो हो जाए,  हां समय लग सकता है लेकिन मैं घर तक छोड़कर ही आऊँगा।

                  ऐसे लोग कहाँ मिलते हैं ? वह भी नई उम्र के लड़के तो हवा में उड़ते हैं और ऊँची-ऊँची चाहतों में चाहे उसके पीछे कोई भी आधार न हो और कितने व्यसनों की शिकार होते हैं।  मैंने अपनी जिंदगी में यह पहला इंसान देखा है जो दिल्ली जैसे शहर में पैदा होकर और ट्रेन में ना बैठा हो।  न उसमें लालच है और न ही मैं लालच रखना चाहता है। 

जीवन के मौन रिश्ते !

 

 

                             ये टास्क ऐसा है , जो हमारे आचार-विचारों की एक छवि तो प्रस्तुत कर ही रहा है। मैं अपने इस कार्य के लिए अपने पतिदेव , बेटियों और उनकी बहुत ही खास सहेलियों के अतिरिक्त किसी को भी पता नहीं है और आज अपनी सखियों के साथ उजागर कर रही हूँ। 

                   मेरी बेटी के एक सहेली बहुत ही अंतरंग है और वे नवीं से लेकर अपने प्रोफेशनल कोर्स और फिर उसके बाद नौकरी तक साथ ही रहीं।  एक ही कॉलेज , इंस्टिट्यूट और हॉस्टल का एक ही कमरा, फिर नौकरी करते हुए दिल्ली में एक ही घर में साथ रहीं।  मेरी बेटी से कम न थी वह।  मेरी उसकी माँ से बाद में मित्रता हुई और एक दिन अचानक वह हृदयाघात से संघर्ष करते हुए चली गयीं। जब उनके जाने से पहले मैं उनके पास गयी तो वह बोलीं  - "आप ऋतु का ध्यान रखना।" 

                  मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि आप अब ठीक हो रहीं है और जल्दी ठीक भी हो जाएंगी लेकिन मेरे वहाँ से बाहर आने के आधा घंटे बाद फिर से अटैक आया और वह चली गयीं। कुल तेरह दिन बहू, बेटा और बेटियाँ  रहीं। बड़ी बेटी शादीशुदा थी और बेटा भी। उनके पापा थोड़े से अक्खड़ टाइप के थे , एक तो अपने अफसर होने का दर्प और दूसरे उन्होंने कभी न ससुराल से और न ही भाइयों से (जो सौतेले थे। ) अधिक सम्बन्ध रखा और न ही पत्नी को रखने दिया। मेरी भी उनसे अधिक बातचीत कभी न हुई थी। 

                          एक दिन मेरी बेटी का दिल्ली से फ़ोन आया - "मम्मी अंकल दो दिन से भूखे हैं, सिर्फ फल पर काम चला रहे हैं। "

                         उसने माजरा बताया कि कुछ दिन उनके सौतेले भाई के यहाँ से खाना आता रहा , एक दिन उनके भतीजे ने पैसे चुरा लिए और उन्होंने उसे पकड़ लिया।   उसके बाद उन्होंने खाना भेजना बंद कर दिया था। 

                           सुबह तो मुझे ऑफिस जाना होता था और मेरा रुट उनके घर के बिल्कुल ही विपरीत पड़ता था। पतिदेव के साथ सेटिंग की , मैं पांच बजे ऑफिस बस से चलती थी और एक स्टॉप पर उतरती और ये मुझे स्कूटर से लेकर उनके घर ले जाते। मैं बैग रख कर पहले चाय बना कर उनको देती और उसी समय में उनके जो बर्तन सिंक में पड़े होते उनको साफ करती और सब्जी भी काट लेती।  चाय पीते पीते जो बातें होतीं फिर सब्जी बना कर उनको रोटियों बना कर खिला देती और सुबह के लिए कुछ बना कर रख देती।  फिर किचन और बर्तन साफ करके घर की और निकलती।  मेरा संयुक्त परिवार है - उसे समय घर में जेठ जेठानी सासूमाँ और हमारी दो बेटियाँ थी।  

                         घर आकर पहले तो सबको चाय बना कर देती और फिर डिनर की  तैयारी करने लगती।  रोज सवाल होने लगता कि इतनी देर कैसे हो जाती है? चाय भी देर से मिलती है , मैं चुप रहती कोई उत्तर मेरे पास नहीं था। शनिवार और रविवार हमारी छुट्टी का दिन होता तो सुबह का खाना इनसे बना कर भेज देती और शाम को वो इनके साथ आ जाते और खाना खाकर चले जाते। घर में किसी को बनाना नहीं पड़ता तो ये सवाल नहीं उठता कि कौन बनाएगा और खिलायेगा ?

                         पूरे तीन महीने मैंने उनके लिए खाने की व्यवस्था की और उसके बाद उनके लिए एक मैड ऐसी खोज कर रखी जो उनका सफाई से लेकर खाने तक पूरी व्यवस्था करती और मैं अपने नैतिक दायित्व के नाते हफ़्ते में एक बार जाकर उनका हाल चाल लेती रही या फिर जब तक वे रहे कोई तकलीफ होती या तबियत ख़राब होती तो ये उनको घर ले आते और फिर यहीं रखती उनको। जब उनका निधन हुआ तो एक दिन पहले उनका फोन आया कि  भैया मेरी तबियत ठीक नहीं है टेस्ट करवाए है और कल आता हूँ और फिर वो कल आया ही नहीं।  ऋतु  का यूएस से फ़ोन आया  - "माते पापा चले गए।" बस इतना सा काम किया जिंदगी में।

दुश्मन को रख देंगे चीर : हम हैं अग्निवीर !

 


दुश्मन को रख देंगे चीर : हम हैं अग्निवीर !


                                ये नारा है अग्निवीरों का।  हाँ वही अग्निवीर  - जिनके लिए जब यह योजना लाई गयी थी तब पता नहीं किसने युवाओं को इसके विरुद्ध भड़काया था कि ये उनको सुनहरे ख़्वाब दिखाए जा रहे हैं और चार साल के बाद ये युवा दर दर के भिखारी बन भटकेंगे। जब अग्नि वीरों की भर्ती हो रही थी तो सरकार की इस योजना की पुरजोर आलोचना की गई थी और इसको विफल करने के लिए उस समय रेल जलाना , बसें जलाने के काम भी किए गए थे। वह कौन थे? जो युवाओं को अग्निवीर में भर्ती के लिए भड़का रहे थे, ये हम खुल कर नहीं कह सकते हैं।  

                                    पिछले दिनों अपनी नासिक से कानपुर की यात्रा के दौरान मुझको अपने ही कंपार्टमेंट में कुछ अग्निवीरों से मुलाकात करने का मौका मिला। बोगी में हम दूर थे लेकिन कानपुर में उतरते समय हम सब एक ही गेट पर खड़े थे तो मैंने सोचा कि उनके कुछ अनुभव और उनके अपनी नौकरी के प्रति विचारों को साझा किया जाए. वह जो अग्निवीर बने वे बहुत ही संतुष्ट है और सरकार की भविष्य की नीतियों के प्रति भी उनके अंदर एक आश्वासन है, जो उन्हें एक सुरक्षित भविष्य देगा।

           . मेरी 8 -10 अग्नि वीरों से मुलाकात हुई जिनकी उम्र 18 से 23 वर्ष के बीच थी। वे अपनी पहली ट्रेनिंग पीरियड पूरा करके 15 दिन की छुट्टी पर अपने घर आ रहे थे और स्टेशन पर उनको रिसीव करने के लिए उनके घर वाले, उनके मित्र सभी एकत्र थे। जितना उत्साह अग्नि वीरों में था, उतना ही उत्साह उनके घर वालों में भी था। उनमें से कुछ अपनी यूनिफॉर्म में थे। जब उनसे पूछा कि आप यूनिफॉर्म में क्यों जा रहे हैं ? वे बोले हमारा मन तो नहीं था लेकिन घर वालों ने कहा कि हम अपने बच्चों को यूनिफॉर्म में देखना चाहते हैं इसीलिए हम यूनिफॉर्म में जा रहे हैं।गाँव से घर वाले स्टेशन पर आ रहे हैं मैंने तो मना किया था लेकिन वो माने ही नहीं है। 
 
                             हमारे साथ पढ़ने वालों में भी बहुत उत्साह है कि हमें इस तरह देख कर वे अपने को खुशनसीब समझेंगे कि हमारा यार देश की सेवा में है।हमारे घर वाले इतने सम्पन्न नहीं हैं कि हमको एन डी ए  के लिए कोचिंग करवा पाते और सरकार के इस कदम ने हमें एक अच्छा मौका दिया है। हम और घर वाले सब खुश हैं।
        
 
         मैंने उनकी अपनी कार्य स्थल और कार्य प्रशिक्षण के प्रति संतुष्टि के बारे में पूछा और पूछा - 
 
1.   आप अपने भविष्य के प्रति आशंकित तो नहीं है?
 
                   तब उन्होंने बताया - " नहीं इससे अच्छा भविष्य हमको नहीं मिलता, हमको 40 हजार रुपए वेतन मिलता है और हमारे सारे खर्च सरकार उठाती है। 4 साल के बाद हमको 14 लाख रुपए मिलेंगे और सिविल एरिया में हमें नौकरी मिलेगी। जिसमें हर क्षेत्र में हमें 25 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। हममें से जो भी सेना की नौकरी को जारी रखना चाहेगा तो उसकी नौकरी जारी रहेगी। इससे अच्छा विकल्प और हमारे लिए क्या हो सकता है ? 
हम अभी उच्च शिक्षित नहीं है लेकिन अपने परिवार के लिए और अपने लिए एक सुरक्षित भविष्य के प्रति निश्चिंत हैं।
 
2. आपकी ट्रेनिंग किस तरह की होती है ? :--
 
                       हमारी ट्रेनिंग बहुत कठिन होती है, जिसके लिए ही हमारी इसमें चयन के समय ही कठिन परीक्षा ली गयी थी और उसमें सफल होने के बाद ही लिया गया। अपने नासिक के प्रशिक्षण काल में  हमको काफी बोझ पीठ , हाथों में लेकर मीलों तक पैदल चलना होता है और यह हमारे दैनिक की क्रिया होती है।हमें कड़े अनुशासन का पालन करना होता है और हमारा "आर्टिलरी प्रशिक्षण केंद्र " है।   हम लोग  आर्टिलरी शाखा में है,  जिसमें हमको सभी अस्त्र-शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है।  गोला आदि का चलाना सिखाया गया है। एक गोले का भार करीब 95 किलो होता है, जिसे हम चार लोग उठाकर डालते हैं और एक बार उसका वार करने पर 40 किलोमीटर तक सब कुछ तबाह हो जाता है। इसलिए हमें निर्णय भी बहुत सोच समझ कर लेने का निर्देश दिया जाता है।हम जहाँ भी जरूरत होती है वहाँ सेना को इन सब चीजों को पहुंचाते भी हैं।  हमें  भारतीय सेना में तोपची , तकनीकी सहायक, रेडिओ ऑपरेटर और चालक के रूप में सेवा करने  का अवसर प्रदान किया जाएगा।
 
3.  आपको  एक साल में कितने दिनों की छुट्टी मिलती है ?  
     
                     हमको साल में 2 महीने की छुट्टी मिलती है , जिसमें १ महीने की कैजुअल और एक महीने की अर्न होती है। और मेडिकल सुविधा हमको सेना की तरफ से प्राप्त होती है। उसे छुट्टी का कोई गणना नहीं की जाती है। बाकी कैंटीन की सुविधा भी मिलती है , जिसे घर वालों के लिए प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि हमें तो सब कुछ वहीँ से मिलती है। 
 
4. आप को अपने काम से संतुष्टि है कोई असुरक्षा का भाव तो नहीं है ?
 
                   बिलकुल भी नहीं , हमारी उम्र में कौन इतना कमा सकता है ? हम अभी आगे की पढाई के लिए जा रहे होते तो अभी पढ़ ही रहे होते।  हम अपने घर का एक मजबूत कन्धा बन चुके हैं और घर वाले भी खुश हैं और हम भी। 
 
                      इनमें से कुछ बच्चे तो कानपूर के आस पास के थे , कुछ लखनऊ , गोण्डा , बलिया, बस्ती  और गोरखपुर के थे। 

नोट :-- ये सारी जानकारी मुझे उन अग्निवीरों से ही प्राप्त हुई है और इससे पहले मैं भी अग्निवीरों के भविष्य के प्रति फैलाई वही भान्तियों का शिकार थी। 
 

रहती थी।  मैंने देखा है घर में दादी से पूछ कर सारे काम होते थे। खेती से मिली नकद राशि  उनके पास ही रहती थी।  लेकिन  उनके सम्मान से पैसे के होने न होने का  कोई सम्बन्ध नहीं था। 

  1 .   वृद्ध माँ  आँखों से भी कम दिखलाई  देता है , अपने पेट में एक बड़े फोड़े होने के कारण एक नीम हकीम डॉक्टर के पास जाकर उसको  ऑपरेट  करवाती है। उस समय  पास कोई अपना नहीं होता बल्कि पड़ोस में रहने वाली  होती है।  वह ही उसको अपने घर दो घंटे लिटा कर रखती है और फिर अपने बेटे के साथ हाथ  कर घर तक छोड़ देती है।

 
2 .   74 वर्षीय माँ घर में झाडू पौंछा करती है क्योंकि बहू के पैरों में दर्द रहता है तो वो नहीं कर सकती है।  उस घर में उनका बेटा , पोता  और पोती 3 सदस्य कमाने वाले हैं   किसी को भी उस महिला के काम करने पर कोई ऐतराज नहीं है।  एक मेट आराम से रखी जा सकती है लेकिन  ?????????? 
 
3.    बूढ़े माँ - बाप को एकलौता बेटा अकेला छोड़ कर दूसरी जगह मकान लेकर रहने लगा क्योंकि पत्नी को उसके माता - पिता पसंद नहीं थे और फिर जायदाद वह सिर पर रख कर तो नहीं ले जायेंगे . मरने पर मिलेगा तो हमीं को फिर क्यों जीते जी अपना जीवन नर्क बनायें। 
 
4 .  पिता अपने बनाये हुए  घर में अकेले रहते हैं क्योंकि माँ का निधन हो चुका है।  तीन बेटे उच्च पदाधिकारी , बेटी डॉक्टर।  एक बेटा उसी शहर में रहता है लेकिन अलग क्योंकि पत्नी को बाबूजी का तानाशाही स्वभाव पसंद नहीं है।  आखिर वह एक राजपत्रित अधिकारी की पत्नी है।

                            आज हम पश्चिमी संस्कृति के  जिस रूप के पीछे  भाग रहे हैं उसमें हम वह नहीं अपना रहे हैं जो हमें अपनाना चाहिए।  अपनी सुख और सुविधा के लिए अपने अनुरूप  बातों को अपना रहे हैं।  आज मैंने  में पढ़ा कि 24 शहरों  में वृद्ध दुर्व्यवहार के लिए मदुरै  सबसे ऊपर है और कानपुर दूसरे नंबर पर है।  कानपुर में हर दूसरा बुजुर्ग अपने ही घर में अत्याचार का  शिकार हैं।  एक गैर सरकारी संगठन  कराये गए सर्वे के अनुसार ये  परिणाम   हैं। 
 
                 हर घर में बुजुर्ग हैं और कुछ लोग तो समाज के डर  से उन्हें घर से बेघर नहीं कर  हैं, लेकिन कुछ  लोग ये भी  कर देते हैं। एक से अधिक संतान वाले बुजुर्गों के लिए अपना कोई घर नहीं होता है बल्कि कुछ दिन इधर  और कुछ दिन  उधर में जीवन गुजरता रहता है।  उस पर भी अगर उनके पास अपनी पेंशन या  संपत्ति है तो बच्चे ये आकलन  करते रहते हैं कि  कहीं दूसरे को तो  ज्यादा नहीं दिया है और अगर ऐसा है तो  उनका जीना दूभर कर देते हैं।  उनके प्रति अपशब्द , गालियाँ या कटाक्ष आम बात मानी जा सकती है। कहीं कहीं तो उनको मार पीट का शिकार भी होना पड़ता है। 
                      इसके कारणों को देखने की कोशिश की तो पाया कि  आर्थिक तौर पर बच्चों पर  निर्भर माता - पिता अधिक उत्पीड़ित होते हैं।  इसका सीधा सा कारण है कि उस समय के अनुसार आय बहुत अधिक नहीं होती थी और बच्चे 2 - 3 या फिर 3 से भी अधिक होते थे। अपनी  आय में अपने माता - पिता के साथ अपने बच्चों के भरण पोषण  में सब कुछ खर्च  देते थे।  खुद के लिए कुछ भी नहीं रखते थे।  घर में सुविधाओं की ओर भी ध्यान  देने का समय उनके पास नहीं होता था।  बच्चों की स्कूल यूनिफार्म के अतिरिक्त दो चार जोड़ कपडे ही हुआ करते थे।  किसी तरह से खर्च पूरा करते थे ,  पत्नी के लिए जेवर  और कपड़े बाद की बात होती थी।  घर में कोई नौकर या मेट नहीं हुआ करते थे, सारे  काम गृहिणी ही देखती थी। सरकारी नौकरी भी थी तो  बहुत कम पेंशन  मिल रही है और वह भी बच्चों को सौंपनी पड़ती है।  कुछ बुजुर्ग रिटायर्ड होने के बाद पैसे मकान  बनवाने में लगा देते हैं। बेटों में बराबर बराबर बाँट दिया।  फिर खुद एक एक पैसे के लिए मुहताज होते हैं और जरूरत पर माँगने पर बेइज्जत किये जाते हैं। 
                      आज जब कि  बच्चों की आय कई कई गुना बढ़ गयी है ( भले ही इस जगह तक पहुँचाने के लिए पिता ने अपना कुछ भी अर्पित  किया हो ) और ये उनकी पत्नी की मेहरबानी मानी जाती है।
-- आप के पास था क्या ? सब कुछ  हमने जुटाया है। 
-- अपने जिन्दगी भर सिर्फ  खाने और खिलाने में उडा  दिया।  
-- इतने बच्चे पैदा करने की जरूरत  क्या थी ? 
-- हम अपने बच्चों की जरूरतें पूरी  करें या फिर आपको देखें।
-- इनको तो सिर्फ दिन भर खाने को चाहिए , कहाँ से आएगा इतना ?
-- कुछ तो अपने बुढ़ापे के लिए सोचा होता , खाने , कपड़े से लेकर दवा दारू तक का खर्च हम कहाँ से पूरा करें ? 
-- बेटियां आ जायेंगी तो बीमार नहीं होती नहीं तो बीमार ही बनी रहती हैं।
-- पता नहीं कब तक हमारा खून पियेंगे  ये , शायद  हमें खा कर ही मरेंगे।  
                          
              अधिकतर घरों में अगर बेटियां हैं तो बहुओं को उनका आना जाना फूटी आँखों नहीं  सुहाता है। अपनी माँ - बाप  से मिलने आने के लिए भी उनको सोचना पड़ता है। 
                   बुजुर्गों का शिथिल  होता हुआ शरीर भी उनके लिए एक समस्या बन जाता है।  अगर वे उनके चार काम करने में सहायक हों तो बहुत  अच्छा,  नहीं तो पड़े रोटियां  तोड़ना उनके लिए राम नाम की तरह होता है।  जिसे बहू और बेटा  दुहराते रहते हैं।  अब जीवन स्तर बढ़ने के साथ साथ जरूरतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि उनके बेटे पूरा नहीं कर पा  रहे हैं।  घर से बाहर  की सारी  खीज घर में अगर पत्नी पर तो उतर नहीं सकती है तो माँ -बाप मिलते हैं तो किसी न किसी  रूप में वह कुंठा उन पर ही उतर जाती है। 
 
                     वे फिर भी चुपचाप सब कुछ सहते रहते हैं , अपने ऊपर हो रहे दुर्व्यवहार की बात किसी से कम ही  उजागर करते हैं क्योंकि कहते हैं - "चाहे जो पैर उघाड़ो इज्जत तो अपनी ही जायेगी न।" फिर कहने से क्या  फायदा ? बल्कि कहने से अगर ये बात उनके पास तक पहुँच गयी तो स्थिति और बदतर हो जायेगी . हम चुपचाप सब सह लेते हैं कि घर में शांति बनी रहे।  ज्यादातर घरों में बहुओं की कहर अधिक होता है और फिर शाम को बेटे के घर आने पर कान भरने की दिनचर्या से माँ बाप के लिए और भी जीना दूभर कर देता है।  पता  नहीं क्यों बेटों की अपने दिमाग का इस्तेमाल करने की आदत क्यों ख़त्म हो चुकी है ? 
 
                       माता-पिता को बीमार होने  पर दिखाने  के लिए उनके पास छुट्टी नहीं होती है और वहीं पत्नी के लिए छुट्टी भी ली जाती है और फिर खाना भी बाहर से ही खा कर  आते हैं।  अगर घर में  रहने वाले को बनाना आता है तो बना कर खा ले नहीं तो भूखा पड़ा रहे  वह तो बीमार होती है।
 
                     हमारी संवेदनाएं कहाँ  गयीं हैं या फिर बिलकुल मर चुकी हैं।  कह नहीं सकती हूँ , लेकिन इतना तो है कि हमारी संस्कृति पूरी तरह से पश्चिमी संस्कृति हॉवी हो चुकी है। रिश्ते ढोए जा रहे हैं।  वे भी रहना नहीं चाहते हैं लेकिन उनकी मजबूरी है कि  उनके लिए कोई ठिकाना नहीं है। 
 
                    आज वृद्धाश्रम इसका विकल्प बनते जा रहे हैं लेकिन क्या हर वृद्ध वहाँ  इसलिए है क्योंकि वे अपने बच्चों के बोझ बन चुके हैं। हमें उनके ह्रदय में अपने बड़ों के लिए संवेदनशीलता रखें और अब तो बुज़ुर्गों के प्रति दुर्व्यवहार करने वालों के लिए दण्ड का प्राविधान हो चूका है लेकिन वयोवृद्ध बहुत मजबूर होकर ही क़ानून की शरण लेते हैं।                     
 
                      * सारे  मामले मेरे अपने देखे हुए हैं।

 वर्क फ्रॉम होम : सुखद या दुखद !


                                   आईटी  कंपनी के लिए वर्क फ्रॉम होम एक अच्छा विकल्प था कि कर्मचारी को कभी आपात काल में घर में बैठ कर काम करने की सुविधा प्राप्त थी और वह इससे कुछ आराम भी महसूस कर सकता था। ये व्यवस्था हर कंपनी में थी  और  करीब करीब  सबको दी जा रही थी और कर्मचारी ले  रहे थे।  लेकिन हद से ज्यादा कोई  सुविधा भी अवसर की जगह गले की फांस बन जाती है। 

              कोरोना की दृष्टि से वर्क फ्रॉम होम एक सुरक्षित और सहज तरीका है , जिससे कार्य भी होता रहे और उनके कर्मचारी सुरक्षित भी रहें।  अब वर्क फ्रॉम होम करते करते लोगों के लिए एक वर्ष पूर्ण होने जा रहा है और कंपनी के काम तो सुचारु रूप से चल रहा है लेकिन उसके कर्मचारियों के लिए एक गले की फाँस बन चुका है। ऑफिस के कार्य करने के वातावरण में और घर के वातावरण में अंतर होता है। अब जब कि बच्चे भी घर में ही अपनी पढाई  कर रहे हैं और  पत्नी भी कामकाजी है तो वह भी अपने काम को किसी न किसी तरीके से सामंजस्य स्थापित करके जारी रख रही है।  

                   बच्चों के लिए स्कूल का वातावरण और घर में रहकर पढाई करने से सबके समय का तारतम्य बैठ नहीं  पाता है।  बच्चे अगर छोटे हैं तो माँ उन्हें साथ लेकर उनकी पढाई करवानी होती है।  ऐसे समय में जब कि न सहायिकाएं बुलाई जा रही हैं और न कोई और साथ दे सकता है तब ये वर्क फ्रॉम होम भी गले की फाँस ही  बना है।  एक गृहणी घर , काम और बच्चे सब का  सामान्य दिनों में प्रबंधन कर लेती हे लेकिन जब सारी जिम्मेदारियां  एक साथ आ खड़ी हों तो पति , अपना और बच्चे की पढाई सामान्यतया  संभव नहीं है।  परिणाम ये होता है कि पति का काम समय से पूरा न हो तो वह भी इसकी जिम्मेदारी परिवार पर ही डालता है , पत्नी भी यही सोचती है लेकिन वह  ही  क्यों खट रही है , क्योंकि हर हाल में सब को सही वातावरण देकर स्वयं को अधिक काम के बोझ तले दबा हुआ देख कर वह अपनी झुंझलाहट किस पर उतार सकती है , बच्चों पर , पति पर न।  इसके बाद घर का वातावरण तनाव पूर्ण ही बन जाता है।  फिर सब एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप लगाने लगते हैं। 

                     स्थितियाँ इसके विपरीत भी बन रही हैं , अगर पति किसी व्यवसाय में है और पत्नी अन्य तरीके से कार्यरत है तो इसमें पति अवसाद का शिकार हो रहा है क्योंकि व्यवसाय लगभग बंद रहे हैं या फिर निश्चित समय  के लिए ही खुल पा रहे हैं।  अगर वह समझदार है तो वह पत्नी के  कार्यों में सहभागिता करके परिवार को एक अलग ही वातावरण दे रहा है और समझदारी भी यही है। लेकिन जरूरी नहीं है कि वह जो चाहता है वह कर सके क्योंकि हर जगह की  अलग कार्य शैली होती है। स्कूल में कार्य करने का समय अलग होता है , सरकारी कार्यालयों में अलग और आईटी कंपनियों में अलग होता है।  

                       इसमें सबसे अधिक होता है कंपनियों की कार्य  शैली में अंतर।  मीटिंग्स और कार्य का कोई समय नहीं होता है क्योंकि आपका मैनेजर या फिर बॉस कभी भी मीटिंग रख लेता है और वर्क फ्रॉम होम में कभी भी  करके आया काम सौप सकता है।  अपने सम्पर्क में आये  कई परिवारों के बच्चों के बारे में सुना है कि अब तो न कोई खाने का समय और न ही सोने का  , हर समय लैपटॉप पर बैठे काम  ही किया करते हैं।  कभी कभी तो  ३ बने तक भी काम होता रहता है।  इससे कर्मचारी के ऊपर कितना दबाव बढ़ जाता है।  ऐसे  कठिन समय ें में जब कि कंपनियों में भी काम करने वालों को निकला जा रहा है, अपनी नौकरी बचने के लिए कर्मचारी हर शर्त और हर हाल में काम करने के लिए मजबूर है। कितने घंटे काम के होते हैं इसकी कोई भी सीमा नहीं होती है। 

                      इससे पहले  कर्मचारी का एक निश्चित कार्यक्रम होता था कि उसको इतने बजे ऑफिस में रिपोर्ट करना है और  इतने बजे निकलना है।  इसके बाद वह अपने परिवार के लिए समर्पित होता था। अब स्थितियां उसके लिए अपने अनुसार नहीं चल रही हैं। कंपनी का पूरा काम हो रहा है, कर्मचारियों को दी जाने वाली यातायात सुविधा की   है लिहाजा उसके चालक या तो बेकार हो चुके हैं या फिर उसके मालिक को नुक्सान हो रहा है।  ऑफिस के रख रखाव का पूरा पूरा व्यय अब उनके लिए बचत ही हो चुकी है।  लेकिन वहीँ कर्मचारी के लिए सारे दिन वाई फाई का लोड और कई सारे व्यय बढ़ चुके हैं। 

                     कंपनी का नजरिया भी कई तरह से ठीक है वह अपने कर्मचारियों की सुरक्षा को देखते हुए ये सुविधा प्रदान कर रही है  और जो बच्चे माँ-बाप से दूर शहरों में काम कर रहे हैं , उन्हें घर आकर एक मुद्दत बाद  उनके साथ रहने का मौका मिल रहा है।  घर में बंद  बच्चों को अपनों का साथ मिल रहा है और माँ-बाप को आंतरिक ख़ुशी भी मिल रही है।   हर सुविधा के दो पहलू होते हैं सुखद और दुखद - ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि उसको हम अवसर के अनुकूल किस  दृष्टि से देख रहे हैं।



                   


                                  

रविवार, 22 जून 2025

आ अब लौट चलें !

 

                आ अब लौट चलें ! 

                                     समाज में रोज ही मनुष्य की मानसिक विकृतियों के समाचारों से क्या अख़बार , क्या सोशल मीडिया भरा पड़ा रहता है।  कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब कि सुर्ख़ियों में ऐसी कोई भी एक घटना न हो। हमने अख़बार पढ़ा या फिर सोशल मीडिया पर स्क्रॉल किया और आगे बढ़ गए, लेकिन क्या सब ऐसा कर पाते हैं। हत्याएँ, आत्महत्याएँ, दुष्कर्म, लूटपाट आदि क्या हैं ? ये आज के सबसे बड़े सामाजिक मुद्दे हैं, लेकिन इतने पर भी हम शायद ये नहीं सोच पा रहे हैं कि इन पर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है ? आधुनिक जीवन शैली और जीवन में स्वच्छंदता चाहने वाली पीढ़ी इसके दुष्परिणामों के विषय में सोच ही नहीं पाती है,  न ही सोचना चाहते हैं। उनकी सोच अब वहाँ तक जाना ही भूल गयी। 

 आज की सोच !  

                  आज की नई पीढ़ी एकल परिवार की पक्षधर है क्योंकि यहाँ उनको कोई भी टोकने रोकने वाला नहीं चाहिए। अपनी नौकरी के बाद उनका मन आएगा तो घर में रहकर आराम करेगी या फिर बाहर जाकर क्लब, पार्टी या फिर घूम-फिर कर तरोताजा होकर डिनर लेकर घर आकर सो जाना पसद करते हैं।  जब तक वे अकेले रहते हैं तब तक तो सब ठीक चलता रहता है, लेकिन परिवार में नए मेहमान के आने के साथ ही उनकी जीवनचर्या बदल जाती है। बच्चे के साथ पहले की तरह से चलना संभव नहीं है।  तब शुरू होता है गृह कलह। जिस स्वच्छंद जीवन के वह लोग आदी होते हैं, वह बिलकुल भी संभव नहीं हो पाता है। यही तो यह स्थिति है, जिससे निबटने के लिए समझदारी से काम लेना होता है और फिर अपने पुराने परिवेश में कुछ अनुशासित रहने की सोचने की जरूरत है।  

                जीवन में या तो इंसान अकेले ही रहने का निर्णय ले, लिव-इन या फिर सिर्फ दो ही रहने के बारे में सोचने लगे हैं। ये न तो सामाजिक दृष्टि से समाधान है और न ही पारिवारिक दृष्टि से। हम सृष्टि के नियमों को तोड़ तो सकते हैं लेकिन फिर एक रोज जब अकेले बिल्कुल अकेले खड़े होते हैं तो आशा भरी नज़रों से उनको देखते हैं जो कहीं से भी हमारे कुछ लगते हैं। नहीं तो अकेले घर में पड़े पड़े दम तोड़ देते हैं। यहीं कहीं तो कई कई दिनों तक पता ही नहीं चलता है कि इस घर में रहने वाला नहीं रहा है। 

 परिवार की सुरक्षा !  

                 रोज नयी-नयी खबरें-  जो बाल यौनशोषण, वर्चुअल ऑटिस्म, उत्श्रृंखलता या फिर छोटी उम्र में जरा सी अनबन या डाँटने पर आत्महत्या  की घटनाओं से लेकर चर्चा का विषय बनती हैं।  यह वहीं ज्यादा होता है, जहाँ दोनों ही कामकाजी होते हैं और बच्चे या तो मेड के सहारे  या पड़ोसियों के घर में छोड़ दिए जाते हैं। हर कदम पर लोग अच्छे ही नहीं होते हैं और फिर कई जगह पर ऐसे ऐसे अपराध सामने आते हैं कि लोगों का विश्वास रिश्तों से उठ जाता है फिर क्या ? इसका विकल्प हमको ही खोजना पड़ेगा।  

              अभी देर नहीं हुई है जब जागो तभी सवेरा - उच्च शिक्षा, कामकाजी होना कोई अपराध नहीं है, लेकिन उसको भी सकारात्मक रूप से देखा जाय। जब तक आप सक्षम हैं, आपको किसी की जरूरत नहीं है लेकिन परिवार वह वृक्ष है जो आपको धूप आने पर छाया देने से इंकार कभी नहीं करेगा। आप अपने रिश्तों को मधुर बनाये रखें। 

ससम्मान रखिए! 

                    आपके माता-पिता भी आपका साथ चाहते हैं और साथ ही बच्चों का भी।  उन्हें आप ससम्मान अपने साथ रखिए। आपके बच्चों को सुरक्षा कवच मिल जाएगा। आपको एक बेफिक्री कि हमारा घर और बच्चे सुरक्षित हैं। रहा सवाल बड़ों की रोक टोक का तो वे कोई किराये पर लाए हुए इंसान नहीं हैं बल्कि आपके अपने हैं, अगर उनका सुझाव या बात उचित है तो स्वीकार कर लीजिए और अगर नहीं है तो उनको समझाइये कि ऐसा संभव नहीं है। उनके पास आपसे ज्यादा अनुभव है सो उसका लाभ लीजिए। 

 वापस लौटना उचित है ! 

                  अपनी संस्कृति से मिले संस्कार और पारिवारिक ढाँचे में ढलना कोई बुरी बात नहीं है। वक्त किसी ने नहीं देखा है , जब जब मुसीबत आती है तो सिर्फ माता-पिता ऐसे होते हैं जो आपके साथ खड़े होते हैं, भले ही उनके पास सीमित साधन हों। हमें वापस लौटने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए।  अपने परिवार और बच्चों के लिए एक सुखद भविष्य बनाने में यदि वापस लौटना उचित है तो वापस आ जाइये। ऐशो-आराम की जिंदगी जो आप जी रहे हैं, उसमें कोई खलल नहीं पड़ेगी बल्कि बच्चों को संस्कार जैसी चीजें मिलेंगी।  वे मोबाइल या टीवी के गुलाम नहीं होंगे। 

एक साथ जरूरी है ! 

                   अपना समझिये तभी उनको घर लाइए। अगर एक नौकरानी या नौकर का विकल्प समझ कर ला रहे हैं तो रहने दीजिए। वापस लौटने का अर्थ है कि आप अपनी जड़ों से फिर से जुड़िए और उनसे वह ग्रहण कीजिए जिसकी आज जरूरत है। रुपये पैसे धन दौलत वक्त पर बहुत कुछ तो होते हैं, लेकिन सब कुछ नहीं होते हैं। समय पर सब कुछ सिर्फ कुछ अपने रिश्ते होते हैं जो कंधे पर हाथ धरे होते हैं। 

 

रेखा श्रीवास्तव 

71, पीडब्ल्यूडी हाउसिंग सोसाइटी  

सहकार नगर , रावतपुर गाँव , कानपूर - 208019 

मोबाइल 9936421567 

Rekha Srivastava 

State Bank of India

Branch - keshavpuram 

IFSC - SBIN0016581  

 

सोमवार, 14 अप्रैल 2025

 

 उम्र खर्च हो गयी

बिना सोचे-समझे,

बहुत पैसे कमाने के लिए।

धनी आज बहुत हैं,

रखने की जगह नहीं,

बस चुप हो गया।

वक़्त ही नहीं मिला संभालें,

जैसे भी थे, कुछ तो करीब थे।

कम अमीर थे,

लेकिन दिल से अनमोल थे,

तब शायद हम खुशनसीब थे।

 

 

सोमवार, 6 जनवरी 2025

जयश्री गांगुली !

 

           जयश्री गांगुली ! (खो गए जो समय के साथ। )

 

                          जयश्री गांगुली यही नाम था उसका, बहुत बड़े घर की बहू और संपन्न घर की सात भाइयों की सबसे छोटी इकलौती बहन। जिसने जीवन में अभाव कभी देखे ही नहीं थे। हाथों हाथ रहने वाली प्यारी सी लड़की थी। बोलने में बहुत मधुर और रवींद्र संगीत में पारंगत होने के साथ साथ बहुत अच्छी चित्रकार थी।   

                   उसका पति एक सैन्य अधिकारी का पुत्र था और बड़ा लाड़ला बेटा, एक कंपनी में मैनेजर था। जयश्री के पिता ने अच्छा घर और वर देख कर शादी कर दी। उनका घर एकदम किसी रईस के घर की तरह था। एक बंगलेनुमा घर में रहते थे। उस समय उनके घर में शानदार रेशमी परदे झूला करते थे। जब वह सब सुख सुविधाएँ, जो मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए जुटाना संभव नहीं था, उनके घर में उपलब्ध थीं। घर जतिन की माँ के अनुरूप ही चलता था क्योंकि एक सैन्य अधिकारी का जीवन जिस अनुशासन में बँधा होता है, वह भी उसी अनुशासन की आदी थीं। 

                 जयश्री एक अनुशासित और अपनी सासुमाँ की आज्ञा पालन करने वाली बहू थी। जितना सुख उसने अपने पिता के घर में उठाया था, उससे ज्यादा ही सुख उसको यहाँ पर भी था। जितना कहूँ , उसके लिए कम ही रहेगा। 

                 जयश्री के दो बेटे थे - बड़ा सुदीप और छोटा प्रदीप।  दोनों बच्चे  एक प्रतिष्ठित कान्वेंट स्कूल में पढ़ रहे थे। उसकी जिंदगी ने एक ऐसी करवट ली कि सब कुछ सारे गुण कहाँ खो गए नहीं मालूम। पति की महत्वाकांक्षाओं ने कंपनी में गबन कर दिया और एक लम्बे समय तक करते रहने के बाद वह पुलिस को तो नहीं सौंपा गया लेकिन उसको निकल कर बाहर कर दिया गया। जयश्री एकदम काँप गयी क्योंकि घर तो सासुमाँ ही चला रही थीं और जतिन की कमाई सिर्फ उसकी शान शौकत के लिए ही होता था। 

               कंपनी से निकल कर जतिन एकदम बेकार होकर अपनी पुरानी आदतों और साथियों को छोड़ नहीं पाया और फिर पैसे के कमाने की लत ने उसको गलत कामों में फंसा दिया। ये जयश्री की गलती थी कि वह पति के आचरण को अब तक समझ नहीं पायीं थी। एक दिन पुलिस की रेड पड़ी और जतिन को नकली नोटों के साथ पकड़ा गया था और घर की तलाशी लेने पर काफी करेंसी बरामद की गयी। पुलिस ने भी बेइज्जत करने का कोई भी कसर नहीं छोड़ी, जतिन को हथकड़ी डाल कर सड़क पर दूर खड़ी जीप तक पैदल चलाते हुए ले गयी। माँ इस सदमे को सह नहीं पाई, उनको हार्ट अटैक पड़ा और वह चल बसी। बचे जयश्री और उसके नाबालिग बेटे - उन्होंने जतिन के छोटे भाई नितिन को सूचना दी और नितिन तुरंत आया। पुलिस सिर्फ माँ की अंतिम क्रिया के लिए जतिन को अपनी कस्टडी में लायी और वापस ले गए। जतिन  भाई को देख कर रो पड़ा और बच्चों को गले लगाकर खूब रोया लेकिन अब कुछ कर नहीं सकता था। 

         नितिन ने माँ के सारे अकाउंट खोलने के लिए कानूनी कार्यवाही करके जयश्री के लिए कुछ समय के लिए आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था कर दी। जयश्री अकेले ही सब लड़ाई लड़ने लगी, लेकिन कुछ महीनों के बाद मकान मालिक ने भी मकान खाली करने के लिए नोटिस दे दिया।  बाकी किराया होने के कारण उसने सामान भी कब्जे में ले लिया। जयश्री अपने जरूरी सामान लेकर अपने पिता के घर चली गयी। वह घर जो उसके लिए हमेशा खुला रहता था, पिता के न रहने पर उसके घर पहुँचने पर किसी ने कोई स्वागत नहीं किया।  लेकिन रहने के लिए उसको पिता का कमरा दे दिया गया। पापा के पास कमरा ही था कोई किचन वगैरह तो नहीं था और सारे भाइयों का अपना अलग अलग पोर्शन था। कुछ ही महीने गुजरे थे कि भाभियों ने कहा कि अब अगर दूसरा घर ले लें तो अधिक अच्छा रहेगा। बच्चे बड़े हो गए हैं तो पापाजी का कमरा भी उनको देना पडेगा। 

               जयश्री ने वहाँ से बहुत दूर कहीं एक मकान खोजा, जो सबसे ऊपर की मंजिल पर बना हुआ एक कमरा और उसके आगे एक बरामदा था बस उसके आगे खुली लम्बी सी छत। इत्तेफाक से उसके उस घर के पास से गुज़रते हुए जयश्री ने देख लिया और जिद करके अपने घर ले गयी। जब उसके कमरे में घुसी तो जैसे किसी ने आसमान से जमीन पर लाकर पटक दिया था -  एक लकड़ी का तख़्त उस पर एक दरी और चादर पड़ी थी। एक लोहे का बक्सा जिस पर कुछ जरूरी सामान रखे थे और सामने स्टूल पर एक टेबल फैन। एक स्टूल पर स्टोव रखा था। उसके उस रईसी ठाठ बाट की साक्षी थी, उसे हालत को देख कर सदमे में आ गयी।

              किसी तरह से घर चलाना था, कभी शौकिया पढ़ाया था, उसको अनुभव था और उसी अनुभव के सहारे नौकरी कर ली। आखिर कितना कर लेती वह , बच्चों की पढाई छूट गयी दोनों ही नाबालिग थे लेकिन संवेदनशील थे, बड़े ने एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली, वहाँ घंटों पर भुगतान होता था और छोटे को कान्वेंट से निकाल कर हिंदी माध्यम में पढ़ना शुरू कर दिया लेकिन मन उसका भी परेशांन रहता था।  रात में सब चुपचाप खाना खाते और सो जाते सुबह से वही रूटीन शुरू हो जाता। 

               एक दिन जतिन जमानत पर छूट कर आया और रातोंरात वह चला गया, घर में बताया या नहीं लेकिन चला गया। कुछ दिन बाद सब चले गए।  कहाँ? किसी को पता नहीं चला। उसे प्यारी सी महिला, जो केयरिंग थी, कुशल गृहणी थी, एक अच्छी माँ और पत्नी थी लेकिन आज दसियों वर्ष हो गए और उसका किसी को भी कुछ भी पता नहीं है।  गुम हो गया एक नाम और इंसान। 

शनिवार, 28 दिसंबर 2024

सम्मान!

 :

                                                   सम्मान!

 

                    असद ने नेट से देखा कि नवरात्रि की पूजा में क्या-क्या सामान लगता है और जाकर बाजार से खरीद लाया। 

             वह बिंदु के आने का बेसब्री से इंतजार रहा था और समय है कि कट नहीं रहा था। वह आँखें बंद करके लेट गया और अतीत में घूमने लगा। 
              2 साल से वह अरब में था और बिंदु यहाँ एक ऑफिस में संविदा पर नौकरी कर रही थी। उनका परिचय फेसबुक से हुआ था। अहद वहाँ अकेला और बिंदु सबके होते हुए भी अकेली थी। वे एक दूसरे के दुःख को महसूस करने लगे थे। असद वहाँ कमा रहा था और घर वाले ऐश कर रहे थे। 
           अचानक असद के अब्बू का इंतकाल हो गया और वह घर लौट आया।  सब कुछ दूर रहते भी उन लोगों ने तय कर दिया था कि बिना किसी को खबर दिए दोनों ने कोर्ट मैरिज कर लेंगे। एक अप्रत्याशित निर्णय था।  
          उसे विश्वास था कि उसके घर वाले तो मान ही जायेंगे क्योंकि घर को इतना संपन्न उसकी कमाई से ही बना लिया है।  लेकिन घर में सवाल उठाते ही - अम्मी ने कह दिया कि वह ऐसे किसी भी कदम से उसको जायदाद से बेदखल कर देगी क्योंकि सारा कुछ तो अब्बू के नाम ही था। 
             उसने बिंदु के घर जाकर शादी की  बात करनी चाही तो बिंदु के घरवालों उसका नाम सुनते ही बेइज्जती करके निकाल दिया। उसको लव जेहाद में फँसाने की धमकी भी दी गयी। छह महीने मामला संभालने की कोशिश की और इंतजार किया।  आखिर में बिंदु ने वहाँ से घर छोड़कर अपना घर बनाने का निर्णय ले लिया। पहले दिन अपने घर जा रही थी। 
        बिंदु के आने की आहट सुनकर उसकी तन्द्रा टूटी। उसने दरवाजा खोलकर झुकते हुए बिंदु का इस्तकबाल किया। 
       बिंदु ने घर में घुसते हुए एक अलमारी में लाल चुनरी नारियल देवीजी की फोटो देखी। उसने असद की ओर मुड़ते हुए पूछा - "ये क्या है?" 
 "तुम्हारी पूजा का सामान क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुमने मेरे लिए घर छोड़ा है लेकिन जो संस्कार खून में बसे हैं , उनकी मैं इज्जत करता हूँ । तुम अपनी पूजा जारी रखना इसी में हमारी खुशी है। 
         उनके घर में दुर्गा सप्तशती और कुरान एक साथ रखे थे।